प्रमाण के प्रकार - हमारे शास्त्रों के अंदर प्रमाण वृत्ति के तीन भाग बताए हैं- पहला है प्रत्यक्ष फिर अनुमान और फिर हमारे शास्त्र आते हैं। अतः किसी भी चीज के प्रमाण के लिए पहले उसका प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिए, उसकी अनुभूति होनी चाहिए। जैसे आपने आग न देखी हो और आप कहें कि मुझे आग दिखाइए, तो मैं आपको अगर कहीं पर...
प्रमाण के प्रकार -
हमारे शास्त्रों के अंदर प्रमाण वृत्ति के तीन भाग बताए हैं- पहला है प्रत्यक्ष फिर अनुमान और फिर हमारे शास्त्र आते हैं। अतः किसी भी चीज के प्रमाण के लिए पहले उसका प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिए, उसकी अनुभूति होनी चाहिए। जैसे आपने आग न देखी हो और आप कहें कि मुझे आग दिखाइए, तो मैं आपको अगर कहीं पर जलती हुई आग दिखा दूँ तो यह हो गया प्रत्यक्ष प्रमाण, जैसे कि भगवान ने अर्जुन को प्रत्यक्ष रूप से अपने विराट स्वरूप को दिखाया। दूसरी चीज होती है अनुमान। जैसे अगर जोर से हवा चल रही हो तो हम अनुमान लगाएंगे कि कहीं आंधी आ रही होगी। अगर नदियों में बाढ आ जाए तो हम अनुमान लगाएंगे कि पहाड़ों पर बहुत बारिश हुई होगी। दूर कहीं हम धुआं देखते हैं तो हम सोचते हैं कि वहां पर आग जल रही होगी। ये सब हैं अनुमान प्रमाण।
इन दो प्रमाणों के पश्चात आदमी के पास केवल शास्त्र प्रमाण रह जाते हैं, जिनके अंदर हमारे संत-महात्माओं ने अपने अनुभवों को लिखा है, उनकी अनुभूति का विषय है, केवल कथनी का विषय नहीं है और अनुभूति हमको भी प्राप्त करनी चाहिए।
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